धर्म-संस्कृति

‘मैथिल समाज किराड़ी’ द्वारा हर्षक संग मनाओल गेल विलुप्त होईत जुड़िशीतल

दिल्ली । समदिया

मिथिलामे मेष संक्रान्तिक अगिला दिन जूड़िशीतल पावनि मनाओल जाइत अछि। एहिमे घरक वृद्ध व्यक्तिक हाथें चानि पर सेमार आ बासि पानि ग्रहण करब अर्थात् जुड़ाएब-पहिल दिन गोसाउनिक सीर पर सेमार आ जल भरल लोटा जे राखल जाइत अछि ओकरे पानि चुरुकमे लए घरक वृद्ध महिला सभक चानि पर ओ जल भोरमे दैत छथिन्ह। गाछ-वृक्षकें पटाओल जाइत अछि,कहल जाइत अछि जे एहिसँ पितर तृप्त होइत छथि। तें गाछ-वृक्षकें जुड़ेबाक ई विधान कएल गेल अछि। घरक चूल्हिमे सेहो बासि भात आ बड़ी पुरैनिक पात पर राखि चढाओल जाइत अछि आ ओहि दिन चूल्हि नै पजरैत अछि।

पहिलुक दिनक राखल दलिपूड़ी, बासि भात, झोरवाला बड़ी, दही आदि एहि दिनक भोजन होइत अछि। चूल्हि नै पजरैत अछि।

एहि प्रकारें हमरालोकनि देखैत छी जे जूड़िशीतल पावनिक विशाल आयाम अछि। एहिमे एक संग धर्मशास्त्रक पालन आ सामाजिक सद्भावक रक्षा सेहो भऽ जाइत छै। प्रकृति संरक्षणक संदेश सेहो ई पावनि दैत अछि।

ओना ई पाबैन आब समाप्ति पर अछि, तथापि हमरा लोकनि एहि पावनिक संरक्षण आ सम्वर्द्धनक लेल प्रयासरत रहबाक चाहि। प्रवासमे रहलाहक बादो मैथिल समाज अपन संस्कार संस्कृतिकेँ संरक्षित करय लेल सदैव प्रयासरत रहैत अछि, ताहिमे सँ एकटा नाम अछि “मैथिल समाज किराड़ी” जे देशक राजधानीक बाहरी दिल्लीक उत्तरी पश्चिमी क्षेत्रमे अवस्थित अछि, जाहि क्षेत्रक ५०% जनसंख्या बिहार वासी आ ताहूमे ३०-३५% मिथिलाक लोकक’ अछि। आजुक समय प्रवासमे मिनी मिथिलाक नामसँ किराड़ी बेस सुविख्यात अछि।

किराड़ीक हृदयस्थ इन्द्र इन्कलेव फेस-1 किराड़ीमे मैथिल समाज किराड़ीक द्वारा मिथिलाक’ प्राकृतिक जनित पाबैन जुड़िशीतलक दिन श्री भद्रकाली मंदिरक प्रांगणमे विलुप्त होइत धुरखेल केर आयोजन कएल गेल,जाहिमे संस्था आ समाजक बहुत लोक हर्षोल्लासक संग सम्मिलित भऽ धुरखेल खेलाय गेलाह।

मैथिल समाज किराड़ीक संस्थापक अध्यक्ष बलराम मिश्र “मैथिल”  द्वारा मिथिलाक गौरवमय मूख्य पावनिमे सँ एक जुड़िशीतल अर्थात बसिया पावनिक बधाई दैत ओ सभकेँ आपसमे मिलिक’ जुड़ायल रहु आ आनंद रही तकर शुभकामना देलाह।

ओ आगु कहलाह जे ओना तऽ गाछ-वृक्षमे सब दिन पानि दैत छियैह मुदा आइ गाछ -वृक्षकेँ सेहो निश्चित रुपसँ जुड़ायल जाइत अछि। मिथिलाक गाम घरमे आजुक दिन पोखैर-इनार खध्धा सबकेँ उड़ाही , आ दलान-बथानकेँ सर-सफाई ( जकरा कोरोना  महामारीक विरुद्ध स्वच्छताक लेल सैनिटाइजिंग  कहल जाइत छलैक, मुदा मिथिलामे आदि कालसँ ई परम्परा अछि)  आ  पोखैर ईनार केर कादो देह हाथमे लगाओल जाइत अछि जे आब प्राय समाप्त भऽ गेल अछि । मुदा  कोरोना कालमे  देखियौ केहेन महामारीक विडंबना छल की सब किछु ग्रामीण परिवेश बला काज भऽ रहल छल, प्रकृति संग समाजिक परिवर्तन भ’ रहल छल, मुदा आब सभ किछु विलुप्त  भेल जा रहल अछि।  मुदा हमरा लोकनिक अपन संस्कार संस्कृतिकेँ संरक्षित करय लेल प्रतीकात्मक धुरखेल निश्चित रुपसँ मनाबैत छी।

ओ कहलनि जुड़िशीतल पाबैन  आबि क’ आइ बितों रहल अछि।  मोन  परैत  अछि  पहिलुका  जुड़िशीतल , बच्चा रहि’,  खूब  थाल-कादो  खेलाइ ।  लोकोक देह  पर  फेकी आ  लोकोसभ  हमरो  देह  पर  फेकैथि ।  इनार  पोखरिक  उड़ाही  होइ।   जंगलमे  सियान  सभ  शिकार  क’र’  जाइथ त’ हमहुं  सभ जाइ ।  खड़हाकें  तकने  फिरी , मुदा कहियौ मुसरीयौ केर शिकार नहिं कऽ सकलौन्ह। भिनसरे  सुतलेमे  माय-काकी  ओ  ठंढा पानि  माथ  पर  ध’  दैत  छलीह ।  मोन माहुर  भ’  जाइत  छल । मुदा आब  ओहि  शीतल  ज’ल  लेल  कतेको  ललाइत  रहैत छथि। की  मोज  मस्ती  रहैक ।  आब सभ्य  होएबाक  चेष्टामे  हम सभ  अपन संस्कृति सँ  कतेक  दूर  भेल  जा  रहल छी ?  मुदा तैयो मैथिल समाज  जाहि  ठाम् छथि ,अप्पन संस्कार ,संस्कृति  रिति रीवाज ,पावनि केर जीवंत  रखबाक  यथोचित  प्रयास  जरूर  करैत  छथि  ! हम सभ जुड़िशीतल दिन प्रतिकात्मक धुरखेल जरुर खेलाइत छी।

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