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नहिं रहलाह अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषदक पूर्व निदेशक डाॅ. अरुण मिश्र

हौ अरुण! एना किएक अनचोकेमे चलि गेलह। एखनि तोहर परिष्कृत ज्ञानक विद्वज्जगतकेँ बहुत आवश्यकता छलैक : रंजना झा
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नई दिल्ली!! “डा• अरुण मिश्र, सरिसबपाही पाहीटोलक, पूर्व प्राध्यापक दर्शनशास्त्र विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्क पूर्व निदेशक , भारतक अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध दार्शनिक विद्वान्, सुच्चा मैथिल दार्शनिकक वेषभूषा, मिथिलाक न्यायशास्त्रक उद्भट विद्वानक शिव सायुज्यक समाद हमरा झकझोड़ि देलक । ओह! हे मित्र! ई अपूरणीय क्षति समस्त मिथिलाक, भारतक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भेल अछि। हमर अश्रुपूर्ण भावपुष्पाञ्जलि स्वीकार करह। ॐ शान्ति: शान्तिः शान्ति:।”
उक्त अभिव्यक्तिक संग दिल्लीसँ रंजना झा मैपुप्र केर ई जनतब देलनि।

ओ आगू कहलनि, आइ मिथिलाक सरिसब पाही परिसरक सुविख्यात न्यायशास्त्रीय परम्पराक संरक्षक – संवर्धक एकटा विश्वस्तरीय विद्वान् क अभावसँ अपूरणीय क्षति भेल अछि।

अरुणजी सरिसब विद्यालय, चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालय होइत दिल्ली विश्वविद्यालयसँ अध्ययन कए दिल्ली विश्वविद्यालयक हुसैन कालेजसँ अध्यापन प्रारंभ कए भारत सरकारक भारतीय विज्ञान, दर्शन एवं संस्कृति परियोजना ICPR मे शोध सम्पादक पदपर आ भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् MHRD मे निदेशक पदपर यथावधि कार्यरत रहि यशस्वी विशिष्ट अध्येता रहलाह। हमरा जानकारीक अनुसार हिनक शोधमूलक अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिक मौलिक ग्रन्थ मुख्यतः अछि —
१- अन्तर्व्याप्ति, २- प्रमाण लक्षणा : स्वरूप और परिष्कार, ३- न्यायमें अप्रमा विचारके विविध प्रस्थान ( जाहिमे २००० सँ अधिक वर्षक महर्षिः गौतमसँ लए अद्यपर्यन्तक भाष्य, अणुभाष्य, वार्त्तिक, टीका, परिशुद्धि, वृत्ति प्रकरण ग्रन्थक अनुशीलन कए विभिन्न प्रस्थानक उद्घाटन कएने छथि।) ४-Spiritual Science and Technology, ed.

हिनक अनेक शोध निबन्ध विभिन्न राष्ट्रीय -अन्तर्राष्ट्रीय शोध जर्नलमे प्रकाशित अछि। जाहिमे :-
१- रत्नकीर्ति का व्याप्ति निर्णय विचार, २- रत्नकीर्ति की अपोह सिद्धि की व्याख्या, ३- सत्कार्यवाद के पक्ष में युक्तियाँ : युक्तिदीपिका के सन्दर्भ में, ४- ज्ञान श्री मित्र का अनुपलब्ध रहस्य, ५- Is Dristanta Necessary in an Inferential process, ६ – पाशचात्य दृष्ट्या क: समीचीनो नैयायिको वल्लभो वा, ७- भासर्वज्ञक अनुसार अनुमान का स्वरूप, ८- प्रमाण लक्षणा : भाष्य से परिशुद्धि पर्यन्त, ९- भारतीय वाङ्मय के मिथिला न्याय परम्परा की दशा एवं दिशा, १०- In search of Purusha : Vidyapati’s attempt in his Purusha Pariksha, 11-Philosophical Foundation of Atmasambad in Kautilya Arthashastra, 12- values and their Relevance : From Kautilya to Vidyapati, 13- Gandhiyon concept of satyagrah, 14- Reflection of philosophy in the story of Harimohan Jha, आदि २७ निबन्ध प्रकाशित छनि जे हमरा ज्ञात अछि।

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