दुर्लभ हरिवासर व्रत योगक संयम-नियम आरंभ : शास्त्री

निज समदिया!! मैपुप्र समदियाकें पं. अजय नाथ झा शास्त्री एखनुक दुर्लभ हरिवासर योगक जनतब दैत कहलनि :
“मिथिला धर्म-संस्कृतिक धरती अछि। धर्मक निर्णय एतय व्यवहारेमे प्रचलित अछि। एतय केर लोकमे शास्त्र-पुराणक कथा, भागवत, रामायण आदिमे अत्यधिक अभिरुचि रहैत अछि। सतत नाम-संकीर्तन, देवी भागवत, पार्थिव महादेव पूजन, यज्ञ-हवन आ नित-प्रति भगवतीक पूजन एवं अनेको देवी-देवताक पूजन होइते रहैत अछि। फलतः एतय दुर्लभ व्रत सभक सेहो प्रचलन अछि, जेना एकादशी, जीतिया, छठि आदि २४ सँ ३६ घंटा धरिक निर्जला व्रत।”
आगू ओ कहलनि, “मुदा एतय केर लोक आर एकटा प्रायः सभसँ कठिन ‘हरिवासर व्रत’ योग लागला पर करैत अछि। दुर्लभ हरिवासर योग ओना कतेको-कतेको बरख पर लागैत छैक, मुदा हालक बरखमे प्रायः दू बरख पहिने लागल छल आ फेर एखनि लागल अछि। ओना तऽ ई व्रत जँ कऽ सकथि तऽ सभ कऽ सकैत छथि, मुदा जनतबक अनुसार प्रायः अधिकतर मिथिलेवासी ई व्रत करैत छथि। बहुत कठीन ई व्रत होइत छैक, जाहिमे ४८ घंटा निर्जला रहय पड़ैत छैक।”
जनतब दैत ओ आगू कहलनि, “ई दुर्लभ ‘हरिवासर व्रत योग’ एखनि लागि रहल अछि, जकर विवरण एहि प्रकारसँ अछि :-:
दुर्लभ हरिवासर व्रत योग (सूर्योदयकाले द्वादशी+बुध+श्रवण योग)
*व्रत नियम :*
रवि, २०-०९-२०२६ : निरामिष भोजन
सोम, २१-०९-२०२६ : एकभुक्त
एकादशी, मंगल, २२-०९-२०२६ : निर्जला व्रत
द्वादशी, बुध, २३-०९-२०२६ : निर्जला व्रत
त्रयोदशी, बृहस्पति, २४-०९-२०२६ : सूर्योदय उपरांत पारण (कुम्हर) + एकभुक्त।”
श्रोत : विश्वविद्यालय पंचांग
